जब एक लड़की ने अपनी बर्बादी के डर को अपनी ताकत बना लिया… एक ऐसी प्रेम कहानी जो प्यार से ज्यादा ‘समझौते’ पर टिकी थी।
प्रस्तावना: गरीबी की मार और एक उम्मीद
कहते हैं, पेट की भूख और घर की गरीबी इंसान को वो सब करने पर मजबूर कर देती है, जो उसने सपनों में भी नहीं सोचा होता। यह कहानी है महिमा की। एक साधारण सी लड़की, जो एक टोल प्लाज़ा (Toll Plaza) पर ऑपरेटर की नौकरी करती थी। तनख्वाह महज 10 से 12 हज़ार रुपये।

महिमा की ज़िंदगी किसी नर्क से कम नहीं थी। पिता शराबी थे, जो घर चलाना तो दूर, उल्टा घर में क्लेश करते थे। माँ दूसरों के खेतों में निंदाई-गुड़ाई करके जो कमाती, उसी से घर का चूल्हा जलता। महिमा का भाई विष्णु और मंगेतर राजू, दोनों ही अभी पढ़ाई कर रहे थे। सर पर जिम्मेदारियों का पहाड़ था और जेब बिल्कुल खाली।
मोड़: महेश की एंट्री और टोल नाके का खेल
उसी टोल प्लाज़ा पर एक एंबुलेंस खड़ी रहती थी, जिसे चलाता था महेश। महेश कोई मामूली ड्राइवर नहीं था। उम्र में महिमा से काफी बड़ा, शादीशुदा और बाल-बच्चेदार। पैसे की उसे कोई कमी नहीं थी, रसूखदार आदमी था। वो एंबुलेंस सिर्फ टाइमपास और टोल पर अपनी ‘बैठक’ जमाए रखने के लिए चलाता था।
किस्मत का खेल देखिये, महिमा की सगाई राजू से हो चुकी थी, लेकिन राजू अभी बेरोजगार था। महिमा जानती थी कि सिर्फ प्यार से घर की छत नहीं डलती और न ही शराबी पिता का कर्ज़ चुकता है। यहीं से शुरू हुई एक अजीबोगरीब दास्तां।
कहानी का मुख्य भाग: समझौता या ज़रूरत?
महेश की नज़र महिमा पर थी और महिमा को ज़रूरत थी एक सहारे की। महेश को अपनी ढलती उम्र में एक नया ‘जोश’ चाहिए था और महिमा को अपने परिवार के लिए एक मज़बूत कंधा। दोनों के बीच टोल की पर्चियों के साथ-साथ नज़रों का लेन-देन शुरू हुआ।

महिमा जानती थी कि वो गलत कर रही है, उसकी सगाई हो चुकी है, लेकिन गरीबी का डर उसे महेश के करीब ले गया। ड्यूटी से ‘बंक’ मारकर दोनों का होटलों में जाना शुरू हुआ।
यहाँ रिश्ता सिर्फ बातों का नहीं था। महेश चाहता था अपनी हवस और जवानी के शौक को पूरा करना, और महिमा ने भी इसमें उसका भरपूर साथ दिया। भले ही उम्र का फासला था, लेकिन बंद कमरे में महिमा ने महेश को वो सुख दिया, जिसकी उसे चाहत थी। दोनों ने एक-दूसरे की ज़रूरतों को समझा—एक को जिस्मानी सुख चाहिए था, तो दूसरे को आर्थिक सुरक्षा।
सस्पेंस: क्या सब खत्म हो जाएगा?
टोल पर सब कुछ सामान्य दिख रहा था, लेकिन अंदर ही अंदर एक खिचड़ी पक रही थी। महेश को पता था कि महिमा की सगाई हो चुकी है। आमतौर पर ऐसी कहानियों में प्रेमी शादी तुड़वा देते हैं या ब्लैकमेल करते हैं। लेकिन महेश का किरदार यहाँ अलग निकला।
महेश महिमा को सिर्फ ‘उपभोग’ की वस्तु नहीं मानता था, वो उसे खुश देखना चाहता था। उसने महिमा की मजबूरी का फायदा नहीं उठाया, बल्कि उसका हाथ थामा—एक अलग तरीके से।
समाधान: घर, गाड़ी और सेटलमेंट
महेश ने अपने रसूख का इस्तेमाल किया। सबसे पहले उसने महिमा के शराबी पिता के नाम पर ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ (PM Awas) का मकान पास करवाया। जो परिवार झोपड़ी नुमा घर में रहता था, महेश की वजह से उनका पक्का मकान बन गया।

लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई। महेश जानता था कि महिमा की शादी के बाद उसे और उसके भाई को रोजगार की ज़रूरत होगी। उसने एक बहुत बड़ा दांव खेला। महेश ने एक नई टैक्सी (गाड़ी) निकलवाई और उसे महिमा के भाई विष्णु और उसके होने वाले पति राजू को पार्टनरशिप में चलाने के लिए दे दिया।
जो लड़के कल तक बेरोजगार थे, महेश की बदौलत आज उनके हाथ में रोजगार था।
क्लाइमेक्स: विदाई और एक नई शुरुआत
शादी का दिन आया। महिमा की शादी राजू से और उसके भाई विष्णु की शादी भी धूमधाम से हुई। महेश ने पीछे रहकर सब संभाला। उसने महिमा की ज़िंदगी में ज़हर नहीं घोला, बल्कि उसे आबाद करके विदा किया।
आज महिमा अपने पति राजू और भाई-भाभी के साथ खुशहाल ज़िंदगी जी रही है। राजू और विष्णु मिलकर टैक्सी चलाते हैं और अच्छा कमाते हैं। महिमा का वो पक्का घर, जो कभी सपना था, आज हकीकत है।
सीख (Moral of the Story)
इस कहानी से हमें तीन बड़ी बातें सीखने को मिलती हैं:
- परिस्थितियाँ और फैसले: महिमा चाहती तो अपने शराबी पिता और गरीबी के माहौल में दबकर अपनी ज़िंदगी ‘नरक’ बना सकती थी। या फिर वो गलत रास्ते पर जाकर पूरी तरह बर्बाद हो सकती थी। लेकिन उसने ‘मध्यम मार्ग’ चुना। उसने अपनी इज़्ज़त और हालात का सौदा ज़रूर किया, लेकिन बदले में अपने पूरे परिवार का भविष्य सुरक्षित कर लिया।
- प्यार का दूसरा रूप: महेश जैसा व्यक्ति, जो पैसे वाला था, चाहता तो महिमा की शादी तुड़वा सकता था या उसे बदनाम कर सकता था। लेकिन सच्चा पुरुष वो है जो किसी की ज़िंदगी खराब न करे। उसने “इस्तेमाल” के बदले “एहसान” और “ज़िंदगी” दी।
- लेवल और औकात: महिमा ने यह नहीं सोचा कि महेश से शादी करके अमीर बन जाऊं (क्योंकि वो पहले से शादीशुदा था)। उसने अपनी लिमिट (Level) पहचानी और सिर्फ उतना ही लिया जिससे उसका और उसके पति का भविष्य बन सके।
निष्कर्ष: कभी-कभी सही और गलत के बीच की लाइन बहुत धुंधली होती है। महिमा ने जो किया, समाज उसे शायद गलत कहे, लेकिन उसी फैसले ने आज उसके पूरे परिवार को सड़क पर आने से बचा लिया। यह कहानी सबूत है कि ज़िंदगी में इमोशन से ज्यादा Practical (व्यावहारिक) होना ज़रूरी है।
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