तूफान में थामे हाथ: पूजा और आदित्य की “शून्य से शिखर” तक की प्रेम कहानी

“कहते हैं कि एक सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है। पूजा और आदित्य की यह शून्य से शिखर प्रेम कहानी (Shunya Se Shikhar Love Story) भी यही साबित करती है कि एक टूटे हुए पुरुष को दोबारा खड़ा करने के लिए एक मजबूत जीवनसाथी का साथ ही काफी है।”

एक साधारण शुरुआत: पूजा की दुनिया

पूजा, मध्य प्रदेश के एक मध्यम वर्गीय परिवार की एक अत्यंत सुंदर और सुशील लड़की थी। वह पढ़ाई में बहुत ज्यादा ‘तेज-तर्रार’ तो नहीं थी, लेकिन समझदारी में उसका कोई सानी नहीं था। उसके पिता श्री मोहनलाल जी और माता श्रीमती सुधा देवी बेहद सीधे-सादे इंसान थे। वे अपनी दुनिया में सिमटे रहते थे और दुनियादारी या दिखावे से उन्हें कोई मतलब नहीं था। पूजा की दो छोटी बहनें भी थीं।

सभी माता-पिता की तरह मोहनलाल जी को भी उम्मीद थी कि पूजा की नौकरी लग जाए तो घर-गृहस्थी अच्छे से चल सके। पूजा की मेहनत रंग लाई और उसका चयन एक प्राइवेट बैंक में हो गया। पोस्टिंग मिली अपने शहर से दूर एक कस्बे की नई खुली शाखा में। पूजा ने हिम्मत नहीं हारी, वह उस कस्बे में किराए का कमरा लेकर रहने लगी और ट्रेनिंग पूरी कर बैंक जॉइन कर लिया।

पहली नज़र का प्यार और बैंक की मुलाक़ातें

किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। बैंक में पूजा का पहला ग्राहक बना आदित्य। आदित्य उसी कस्बे का एक मध्यम वर्गीय, छोटा व्यापारी था। जब वह अपना खाता खुलवाने पूजा की डेस्क पर पहुँचा, तो पूजा की सादगी और काम करने के तरीके ने उसका दिल जीत लिया। यह पहली नज़र का प्यार था।

उसके बाद तो जैसे बैंक जाना आदित्य की दिनचर्या बन गई। कभी पैसा जमा करने, तो कभी निकालने। बहाना बस पूजा को देखना होता था। धीरे-धीरे हिचक खुली। बैंकिंग के काम के बहाने नंबरों का आदान-प्रदान हुआ। कभी “मैडम, खाना खाया?” से शुरू हुई बात, “कभी हमारी फैक्ट्री देखने आइये” तक पहुँच गई। पूजा ने भी महसूस किया कि आदित्य एक नेक दिल इंसान है। दोनों ने एक-दूसरे को अपना लिया।

शादी की कठिन डगर: परिवार का विरोध

प्यार करना आसान था, लेकिन उसे रिश्ते में बदलना मुश्किल। जब पूजा ने अपने घर बताया, तो उसके माता-पिता डर गए। वे सादे लोग थे, उन्हें लगा कि बड़ी बिरादरी और व्यापारी वर्ग में बेटी देना समाज में अलग संदेश देगा।

दूसरी तरफ, आदित्य के पिता श्री रामेश्वर जी और माता श्रीमती सावित्री देवी ने तो साफ़ मना कर दिया। उनका सपना था कि उनके बेटे के लिए कोई अमीर घर की बहू आए, न कि कोई मामूली नौकरी करने वाली लड़की। उन्होंने कहा, “एक साधारण बैंक क्लर्क हमारे घर की बहू नहीं बन सकती।”

तमाम अड़चनों, तानों और “असंभव” लगने वाली स्थितियों के बीच, पूजा और आदित्य की जिद जीत गई। दोनों ने समाज और परिवार के विरोध के बावजूद शादी कर ली।

ससुराल में बेगानी पूजा और संघर्ष के दिन

शादी तो हो गई, लेकिन पूजा का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। ससुराल में उसे वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी। सास सावित्री देवी ने पूजा के हाथ का खाना खाने से मना कर दिया। घर में एक ही छत के नीचे दो चूल्हे जलने लगे—एक सास का, एक पूजा का। आदित्य को यह देखकर बहुत दुख होता था। पूजा का नौकरी पर जाना भी सास-ससुर को खटकता था।

बावजूद इसके, पूजा ने कभी शिकायत नहीं की। वह सुबह जल्दी उठती, अपना और आदित्य का खाना बनाती, बैंक जाती, और शाम को आकर फिर घर संभालती। उसने अपनी सैलरी से घर की छोटी-मोटी जरूरतें पूरी कीं और अपनी बहनों की मदद भी जारी रखी। यह सब देखकर उसके माता-पिता (मोहनलाल जी) को तसल्ली हुई कि उनकी बेटी समझदार हो गई है।

360 डिग्री का बदलाव: खुशियों की दस्तक

समय बीतता गया। आदित्य ने अपने कारोबार को बढ़ाने का फैसला किया। पूजा ने इसमें अहम भूमिका निभाई। उसने अपनी बैंक से आदित्य को लोन दिलवाया और उसे सही वित्तीय सलाह दी। मेहनत रंग लाई। आदित्य का बिज़नेस चल पड़ा। जो घर कभी तंगी में था, वहां अब शानो-शौकत थी। चार साल में पूजा का प्रमोशन भी हो गया। बाहर से सब कुछ भव्य दिख रहा था। आदित्य के माता-पिता भी अंदर ही अंदर खुश थे कि बहु के आने से घर में लक्ष्मी आई है, लेकिन अपने अहंकार के कारण उन्होंने कभी खुलकर पूजा को अपनाया नहीं।

कुदरत का कहर: सब कुछ खत्म

कहानी में असली मोड़ तब आया जब आदित्य को एक बहुत बड़े व्यापारी से लाखों का प्रोडक्ट ऑर्डर मिला। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा मौका था। आदित्य ने अपनी सारी जमा पूंजी, बाज़ार से उठाया हुआ पैसा और पिछला मुनाफा सब कुछ कच्चा माल (Raw Material) खरीदने और माल तैयार करने में लगा दिया।

फैक्ट्री में माल बनकर तैयार था, बस डिलीवरी होनी थी। लेकिन उस रात कुदरत ने अपना रौद्र रूप दिखाया। भयानक बारिश हुई। बिजली कड़की और ऐसी मूसलाधार बारिश हुई कि कस्बे में पानी भर गया। आदित्य की फैक्ट्री में रखा सारा तैयार माल और कच्चा सामान पानी में डूब गया। वह प्रोडक्ट खराब हो चुका था।

सुबह जब आदित्य फैक्ट्री पहुँचा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सब कुछ बर्बाद हो चुका था। वह व्यापारी, जिसे 10 दिन में माल देना था, उसने अपना पैसा वापस माँगा। करार (Agreement) के मुताबिक आदित्य को पैसा लौटाना पड़ा।

इज्जत बचाने और कर्ज चुकाने के लिए आदित्य को अपनी फैक्ट्री, मशीनें और यहाँ तक कि घर का कुछ हिस्सा भी बेचना पड़ा। वह “हीरो से जीरो” हो गया। आदित्य के माता-पिता टूट गए। उन्होंने अपने समधी (पूजा के पिता) से रोते हुए कहा, “हमारी खुशियों को किसी की नज़र लग गई, हम सड़क पर आ गए।”

‘हीरो’ की वापसी: पूजा का त्याग और समर्पण

जब सबने उम्मीद छोड़ दी, तब पूजा ढाल बनकर खड़ी हुई। उसने टूटे हुए आदित्य और अपने सास-ससुर को संभाला। उसने कहा, “जब तक मैं हूँ, हम हार नहीं मानेंगे।”

पूजा ने अपनी बैंक की नौकरी जारी रखी और घर का खर्चा चलाया। उसने अपनी पर्सनल सेविंग्स और बैंक से अपने नाम पर पर्सनल लोन लेकर आदित्य को दिया ताकि वह फिर से काम शुरू कर सके। पूजा ने न केवल पैसा दिया, बल्कि आदित्य का मनोबल भी बढ़ाया।

धीरे-धीरे, आदित्य ने एक छोटी सी जगह से फिर शुरुआत की। पूजा की नौकरी से घर चलता रहा और आदित्य बिज़नेस जमाता रहा। पूजा की मेहनत और त्याग ने आदित्य को फिर से खड़ा कर दिया। वह दोबारा अपने पैरों पर खड़ा हो गया—वाकई “जीरो से हीरो” बनकर।

सुखद अंत: रिश्तों की नई सुबह

इस बुरे वक्त ने आदित्य के माता-पिता की आँखें खोल दीं। उन्हें एहसास हुआ कि जिसे वे ‘साधारण लड़की’ समझकर दुत्कार रहे थे, असल में वही उनके घर की ‘अन्नपूर्णा’ और ‘लक्ष्मी’ है।

आज नज़ारा बदल चुका है। अब घर में दो चूल्हे नहीं जलते। अब सास सावित्री देवी खुद आगे बढ़कर बहू का हाथ बटाती हैं, बर्तन धो देती हैं और पूजा के ऑफिस से आने पर उसे गरम खाना खिलाती हैं। उन्हें गर्व है कि उनकी बहू ने उनके बेटे को राजा बना दिया। आदित्य की बहनें भी अब अपनी भाभी की मिसाल देती हैं।

इस शून्य से शिखर प्रेम कहानी से सीख (Moral of the Story)

  1. जीवनसाथी का चुनाव: जीवनसाथी वह नहीं जो केवल सुख में साथ दे, असली साथी वह है जो तूफान में भी आपका हाथ न छोड़े।
  2. दिखावा नहीं, गुण देखें: इंसान की पहचान उसके पैसे या रूतबे से नहीं, बल्कि उसके संस्कारों और संकट में साथ निभाने की क्षमता से होती है।
  3. हिम्मत और धैर्य: वक्त चाहे कितना भी बुरा क्यों न हो, अगर परिवार एकजुट है और इरादे मजबूत हैं, तो इंसान दोबारा खड़ा हो सकता है।

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वास्तव में पूजा और आदित्य की यह शून्य से शिखर प्रेम कहानी हर उस जोड़े के लिए मिसाल है जो मुश्किल वक्त में हार मान लेते हैं।

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