
कहते हैं, जीवन की नींव बचपन में ही पड़ जाती है। रौशनी अभी महज 3 साल की ही थी कि सर से माँ का साया उठ गया। पिता कनीराम जी, जो एक बेहद जुझारू और कर्मठ किसान थे, उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी खुद की खेती के साथ-साथ वो बटाई पर भी जमीन लेकर दिन-रात पसीना बहाते थे। लेकिन पत्नी के जाने के बाद घर सूना हो गया, तो उन्होंने अपनी लाडली रौशनी को उसकी बुआ शांतिबाई के पास भेज दिया।
कनीराम जी ने बाद में विद्या नाम की महिला से शादी की, जिससे उन्हें एक बेटा पंकज मिला। रौशनी अपनी बुआ के पास संस्कारों में पली-बढ़ी। पढ़ने में इतनी तेज और ‘एग्रेसिव’ थी कि क्लास में हमेशा अव्वल आती।
पहला प्यार और समाज की बेड़ियाँ
जवानी की दहलीज पर रौशनी को अपनी ही क्लास के विनायक से बेइंतहा मोहब्बत हो गई। वो चाहती थी कि विनायक ही उसका जीवनसाथी बने। विनायक भी उस पर जान छिड़कता था। लेकिन रौशनी पढ़ी-लिखी होने के साथ-साथ पुराने ख्यालात और मर्यादाओं में बंधी थी। उसने अपने दिल पर पत्थर रखकर विनायक से कहा- “मैं अपनी बुआ और फूफाजी की इज्जत नीलाम नहीं होने दूंगी। तुम मेरी समाज के नहीं हो, और मैं समाज की बेड़ियां नहीं तोडूंगी।”
उसने अपने बचपन के प्यार की कुर्बानी दे दी और अपने पिता के घर वापस आ गई। वहां सौतेली माँ विद्या और भाई पंकज के साथ उसका खूब स्नेह बना रहा।
गृहस्थी और तरक्की: रंजीत का साथ
रौशनी की शादी समाज के ही एक लड़के, रंजीत से हुई। रंजीत भले ही सरकारी नौकरी में नहीं था, लेकिन वो एक समझदार इंसान था। उसने अपनी मेहनत से चाय की होटल (Tea Stall) खोली, जो चल निकली। उधर, रौशनी की सरकारी नौकरी लग गई, वो टीचर बन गई।

किस्मत ने करवट ली। एक साधारण परिवार ‘अपग्रेड’ होकर मिडिल क्लास से ऊपर उठ गया। घर बन गया, गाड़ी आ गई, और आंगन में एक बेटे की किलकारियां गूंज उठीं। रंजीत को लगा जैसे उसे दुनिया की सारी खुशियां मिल गईं। वो रौशनी को सिर-आंखों पर बिठाकर रखता था।
भटकन: विनायक की परछाई और आदित्य का आना
ज़िंदगी की गाड़ी पटरी पर दौड़ रही थी, लेकिन रौशनी के स्कूल में एक नया मोड़ आया—आदित्य। वो भी रौशनी के साथ टीचर था। न जाने कब, साथ पढ़ाते-पढ़ाते रौशनी को आदित्य में अपना पुराना प्यार विनायक नज़र आने लगा।
आदित्य भी शादीशुदा था, लेकिन दोनों मर्यादा की लकीर लांघ गए। रौशनी आदित्य के प्यार में इस कदर पागल हो गई कि उसे अपना हंसता-खेलता परिवार धुंधला दिखने लगा। आदित्य शराब का आदी था, लेकिन रौशनी ने इसे भी नज़रअंदाज़ किया।
वो काली रात और रंजीत के आंसू
हद तो तब हो गई जब रौशनी ने घर पर झूठ बोला कि वो स्कूल के टूर पर जा रही है। वो आदित्य के साथ उसके दोस्त के रूम पर गई। वहां उसने मर्यादा की सारी सीमाएं तोड़ दीं और आदित्य के साथ शारीरिक संबंध बनाए। उसे लगा कि उसे उसका प्यार मिल गया है।
लेकिन, झूठ के पांव नहीं होते। एक दिन रंजीत ने अपनी पत्नी को आदित्य के साथ कार में जाते हुए देख लिया। रंजीत का दिल टूट गया। जब रौशनी घर आई और बिना कुछ कहे सो गई—न बच्चे का पूछा, न पति का—तो रंजीत फूट-फूट कर रोया। उसने सोचा, “मैंने तो इसे देवी माना था, पर इसने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा किया।”
आदित्य का असली चेहरा: बर्बादी का मंज़र
कहानी में असली ट्विस्ट अब आता है। आदित्य स्कूल में शराब पीते हुए पकड़ा गया और उसे नौकरी से निकाल दिया गया। अब वो पूरी तरह से निठल्ला हो गया।

- स्टॉक मार्केट और जुआ: आदित्य को शेयर बाज़ार (Stock Market) की लत थी। नौकरी जाने के बाद वह पूरी तरह रौशनी की कमाई पर निर्भर हो गया।
- पैसों की भूख: शुरुआत में वो रौशनी से आधी सैलरी मांगता, फिर धीरे-धीरे पूरी सैलरी हड़पने लगा। वो रौशनी के पैसे जुए और ट्रेडिंग में उड़ा देता।
- बर्बादी की कगार: रौशनी के घर के हालात बिगड़ने लगे। बेटे की स्कूल फीस भरने तक के लाले पड़ गए।
रौशनी, जो कभी स्वाभिमान की मूरत थी, अब आदित्य के इशारों पर नाच रही थी। रंजीत ने यह सब अपनी सास और साले को बताया। उन्होंने रंजीत को समझाया— “जमाई जी, थोड़ा सब्र रखिए, हम इसे समझाएंगे। आप कोई कड़ा कदम मत उठाना।”
फैसले की घड़ी
“घर बेच दो” आदित्य का खुद का घर बिक चुका था, वो किराए के मकान में रहता था। उसकी नीयत इतनी गिर गई कि एक दिन उसने रौशनी से कहा— “रौशनी, तुम अपना यह घर बेच दो, मुझे पैसों की सख्त जरूरत है। हम कहीं और रह लेंगे।”
बस! यही वो पल था जब रौशनी की आंखों पर पड़ा प्यार का पर्दा हट गया। उसे एहसास हुआ कि यह शख्स उससे प्यार नहीं करता, बल्कि उसका सिर्फ ‘इस्तेमाल’ कर रहा है। “आज यह घर बेचने को कह रहा है, कल मुझे और मेरे बेटे को भी दांव पर लगा देगा,” रौशनी का जमीर जाग उठा। उसने सोचा, मैंने जिस विनायक को छोड़ा था, वो प्यार था, लेकिन आदित्य तो सिर्फ एक जोंक है जो मेरा खून चूस रहा है।
वापसी और प्रायश्चित रौशनी ने एक कठोर और सही फैसला लिया। उसने आदित्य को हमेशा के लिए अपनी जिंदगी से ‘ब्लॉक’ कर दिया। उसने रंजीत से माफी नहीं मांगी, बल्कि अपने कर्मों से साबित किया। रंजीत ने भी बड़प्पन दिखाते हुए पुरानी बातों को मिट्टी डाल दी, क्योंकि वो अपना घर तोड़ना नहीं चाहता था।

रौशनी ने फिर से पढ़ाई और काम पर ध्यान दिया। उसका ट्रांसफर दूसरे स्कूल में हो गया और अपनी काबिलियत से वो प्रधानाध्यापक (Headmistress) बन गई। आज रंजीत अपनी होटल चला रहा है और रौशनी स्कूल। घर में फिर से खुशियां लौट आईं। उसने खुद को बर्बाद होने से बचा लिया।
इस कहानी में ‘शिक्षित’ (Literate) और ‘समझदार’ (Educated) होने के बीच का गहरा अंतर दिखता है।
- डिग्री बनाम विवेक: रौशनी और आदित्य दोनों ‘शिक्षित’ (Teacher) थे, उनके पास डिग्रियां थीं। लेकिन आदित्य ने ‘अशिक्षितों’ से भी गया-गुजरा काम किया। उसने अपनी शिक्षा का उपयोग नहीं किया, बल्कि व्यसनों में डूब गया। वहीं रौशनी, जो पढ़ी-लिखी थी, भावनाओं में बहकर अपनी शिक्षा और संस्कारों को कुछ समय के लिए भूल गई थी।
- असली अनपढ़ कौन?: रंजीत, जो शायद उतना हाई-क्वालिफाइड नहीं था और चाय की दुकान चलाता था, उसने सबसे बड़ी ‘समझदारी’ दिखाई। एक अशिक्षित या कम पढ़ा-लिखा इंसान जब रिश्तों को संभालने का धैर्य दिखाता है, तो वो असली मायने में ‘ज्ञानी’ होता है। अगर वो गुस्से में आकर रौशनी को छोड़ देता, तो आज तीन जिंदगियां (रौशनी, रंजीत और उनका बेटा) बर्बाद होतीं।
- निर्णय क्षमता (Decision Making): शिक्षा का असली मतलब तब समझ आया जब रौशनी ने ‘Cost-Benefit Analysis’ किया। उसने देखा कि आदित्य के साथ सिर्फ ‘नुकसान’ (Loss) है—आर्थिक भी और सामाजिक भी। एक शिक्षित व्यक्ति गिर सकता है, लेकिन उसके पास वापस उठने और सही विश्लेषण करने की क्षमता होती है, जो रौशनी ने अंत में दिखाई। उसने अपनी गलती मानी नहीं, बल्कि उसे सुधारा।
कहानी का सार: इंसान गलतियों का पुतला है। भटकना आसान है, लेकिन उस भटकन से खुद को निकालकर वापस सही रास्ते पर लाना ही असली ‘रौशनी’ है।