अक्सर जवानी के जोश में हम वो फैसले ले लेते हैं जो पूरी जिंदगी का नासूर बन जाते हैं। यह कहानी मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव की है, जहां प्यार और आकर्षण के बीच का बारीक अंतर न समझ पाने की वजह से एक हंसते-खेलते परिवार की इज्जत दांव पर लग गई। यह कहानी है महेश और शारदा की।
बचपन का प्यार या सिर्फ आकर्षण
मध्य प्रदेश के एक शांत गांव में रामलाल जी रहते थे, जिनका बेटा था महेश। सीधा-साधा, मेहनती और मां-बाप का आज्ञाकारी। उसी गांव में रहती थी शारदा। स्कूल के दिनों से ही दोनों के बीच एक खिंचाव था, जिसे उन्होंने प्यार का नाम दे दिया। महेश के लिए शारदा ही उसकी दुनिया थी, लेकिन शारदा… वह शायद प्यार से ज्यादा अपनी इच्छाओं की गुलाम थी।

शारदा पढ़ाई-लिखाई में कमजोर थी, उसका मन किताबों में कम और आशिकी में ज्यादा लगता था। जब शादी की बात उठी, तो समाज की दीवारें खड़ी हो गईं। शारदा के पिता, शिवनारायण जी को यह रिश्ता मंजूर नहीं था। वे अपनी बेटी को उसी समाज में, लेकिन किसी दूसरे गांव में ब्याहना चाहते थे।
झूठा इल्जाम और सलाखों के पीछ
महेश ने शारदा से शादी की जिद पकड़ी, लेकिन शारदा के घरवालों ने एक खतरनाक चाल चली। उन्होंने थाने में महेश के खिलाफ छेड़छाड़ और प्रताड़ना की झूठी रिपोर्ट लिखवा दी। जब पुलिस ने शारदा से पूछा, तो वह चुप रही। उसकी उस चुप्पी ने महेश को दो महीने के लिए जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया।
जेल से छूटने के बाद, महेश का प्यार कम होने के बजाय और बागी हो गया। वह शारदा से मिला। जज्बात हावी हुए, दोनों एक बाड़े में मिले और वहां शारीरिक संबंध बने। उस पल के आवेश में शारदा ने कहा, “यहाँ रहे तो ये लोग हमें जीने नहीं देंगे, चलो भाग चलते हैं।”
और बस, यहीं से शुरू हुई बर्बादी की असली कहानी।
शहर की कड़वी हकीकत और वासना की भूख
महेश और शारदा घर से भागकर एक अनजान शहर में आ गए। न सिर पर छत, न जेब में पैसा। किसी तरह एक सस्ती सी जगह पर किराये का कमरा लिया, जहाँ आस-पास कई और किरायेदार रहते थे।
महेश ने अपनी जवानी झोंक दी। वह दिन भर “दिहाड़ी मजदूरी” करता, ईंट-पत्थर ढोता ताकि शारदा को दो वक्त की रोटी खिला सके। शाम को जब वह थक-हार कर घर आता, तो उसका शरीर टूट चुका होता था। लेकिन शारदा? शारदा को महेश की मेहनत नहीं, बल्कि अपनी ख्वाहिशें पूरी न होने का मलाल था। उसे सजने-संवरने का शौक था, उसे ऐश-ओ-आराम चाहिए था, जो एक मजदूर महेश उसे नहीं दे पा रहा था।

जब महेश काम पर जाता, शारदा का मन भटकने लगा। उस चॉल में रहने वाले स्कूल के लड़के हों या अन्य मजदूर, शारदा उनसे नज़दीकियाँ बढ़ाने लगी। वह प्यार की नहीं, बल्कि शारीरिक सुख और पैसों की भूखी थी। जब महेश को लोगों से पता चला कि उसकी गैर-मौजूदगी में शारदा दूसरों के साथ गंदी बातें करती है और घुलती-मिलती है, तो वह उसे लेकर लखनऊ अपने दोस्त राजेश के पास चला गया।
दोस्त का धोखा और आखिरी चोट
महेश ने सोचा था कि दोस्त के पास रहकर हालात सुधरेंगे। उसने वहां ऑटो चलाना शुरू किया। दिन-रात मेहनत करता। लेकिन यहाँ शारदा को राजेश की रईसी भा गई। राजेश के पास किराये के कमरों से अच्छा पैसा आता था।
महेश जब ऑटो चलाने जाता, पीछे से शारदा और राजेश के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं। शारदा ने अपनी वफादारी और शरीर, दोनों राजेश को सौंप दिए—सिर्फ चंद पैसों और उपहारों के लिए।

जब महेश ने अपनी आँखों से अपनी बर्बादी देखी, तो वह टूट गया। वह रोया, गिड़गिड़ाया, लेकिन शारदा ने उसे ठुकरा दिया। उसने राजेश से मंदिर में और फिर कोर्ट में शादी कर ली। महेश के पास अब न प्यार था, न दोस्त, और न ही घर। वह पूरी तरह से “निठल्ला” और अकेला महसूस करने लगा। उसे समझ आ गया कि माँ-बाप की बात न मानकर उसने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है।
घर वापसी और प्रायश्चित
थक-हार कर महेश ने अपने पिता रामलाल जी को फोन किया। पिता का दिल पसीजा, माँ ने डांटा लेकिन बेटे को सुधारने का मौका दिया। उन्होंने उसे सीधे घर बुलाने के बजाय कुछ दिन मौसी के घर रहने को कहा, ताकि मामला शांत हो जाए।
माँ ने उसे फोन पर ही खरी-खोटी सुनाई: “लड़की के चक्कर में तूने अपना जीवन बर्बाद कर लिया। न तू घर का रहा, न घाट का। अब अक्ल ठिकाने आई?”
उस समय महेश ने कसम खाई कि अब वह वही करेगा जो उसके माता-पिता कहेंगे।
नयी शुरुआत: असली खुशी
समय के साथ जख्म भरे। महेश गांव वापस आया। पिता ने उसे बटाई पर खेत लेकर दिया। उसने जी-तोड़ मेहनत की। घर वालों ने उसकी शादी ‘सुनीता’ से करवाई। सुनीता शारदा जैसी नहीं थी; वह समझदार, संस्कारी और मेहनती थी।
आज महेश और सुनीता खेत में साथ काम करते हैं, पसीना बहाते हैं और शाम को सुकून की रोटी खाते हैं। उनकी एक प्यारी सी बेटी है। आज महेश जब अपनी बेटी को देखता है और सुनीता का साथ पाता है, तो उसे एहसास होता है कि असली सुख ‘भटकने’ में नहीं, ‘टिकने’ में है।
जीवन की सीख
महेश आज भी कभी-कभी पुराने दिनों को याद करके सिहर उठता है। उसे दुख होता है कि उसने धोखा खाया, लेकिन खुशी इस बात की है कि समय रहते संभल गया।
यह कहानी हमें सिखाती है कि:
- माँ-बाप का अनुभव: माता-पिता अगर किसी रिश्ते के खिलाफ हैं, तो उसके पीछे कोई ठोस वजह होती है।
- प्यार बनाम आकर्षण: शारीरिक आकर्षण और वासना को प्यार समझ लेना जवानी की सबसे बड़ी भूल है।
- धोखा और कर्म: जो अपने परिवार को धोखा देकर भाग सकता है, वह आपको भी धोखा दे सकता है।
महेश आज खुश है, क्योंकि उसने अपनी गलती मानी और ‘अपनों’ के पास लौट आया।
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