
दो दुश्मन राज्यों की सीमा पर हर तरफ सिर्फ आग, खून और मौत की बदबू। ऊपर पहाड़ियों पर बसा विजयनगर — ऊँचे किले, मजबूत दीवारें, जहाँ से पूरा मैदान नजर आता था। नीचे घाटी में फैला धर्मपुर — उपजाऊ ज़मीन, बहती नदियाँ, जहाँ पानी और खेती का राज था। दोनों राज्यों के बीच सिर्फ एक संकरी नदी और एक पुराना पुल था — और यही पुल सालों से खूनी जंग का कारण बना हुआ था। विजयनगर को लगता था कि नीचे की ज़मीन और पानी उनका हक है। धर्मपुर को लगता था कि ऊपर से आने वाली नदियाँ उनका अधिकार हैं। इस वजह से दोनों तरफ के लोग सालों से एक-दूसरे के खून से हाथ रंगते आ रहे थे।
फिर आया वो दिन… धर्मपुर में राजा की आखिरी सांसें चल रही थीं। कोई बेटा नहीं था। इसलिए राजकुमारी सिया ने कवच पहना, तलवार उठाई और खुद सेना की कमान संभाली। वो घोड़े पर सवार होकर चीख रही थी — “रुको मत! लड़ो! ये हमारा राज्य है!” दूसरी तरफ विजयनगर का राजकुमार विक्रम अपनी सेना को जीत की ओर ले जा रहा था। आँखों में जीत का भरोसा, तलवार हाथ में, वो आगे बढ़ रहा था।
तीरों की बौछार हो रही थी। अचानक… एक घातक तीर सीधा सिया के कंधे में जा धड़कता है। वो घोड़े से गिरती है। खून बहने लगता है। सेना चीख उठती है। हार अब बहुत करीब है।
तभी… एक ऐसा पल आता है, जो पूरी दुनिया को हिला देता है। दुश्मन राजकुमार विक्रम… तेजी से दौड़ता है। सबके देखते-देखते वो सिया को गोद में उठाता है… और जंगल की गहराई में गायब हो जाता है।
क्यों? क्यों दुश्मन ने दुश्मन की जान बचाई? क्या ये प्यार की पहली झलक थी? या मौत का सबसे बड़ा जाल?
अगर ये राज किसी को पता चल गया… तो दोनों को मौत की सजा मिलेगी। दोनों राज्यों के राजा, दोनों के पिता, युद्ध जारी रखना चाहते थे। प्यार की खबर उनके लिए सबसे बड़ा अपराध थी।
जंगल में एक छोटा सा छिपा हुआ झोपड़ा। विक्रम ने सिया को वहाँ लिटाया। उसके घाव पर मरहम लगाई। सिया होश में आई। आँखें खुलीं तो सामने दुश्मन राजकुमार। गुस्से से बोली, “तुम… तुम दुश्मन हो! मुझे क्यों बचाया?”
विक्रम ने शांत स्वर में, लेकिन आँखों में कुछ अलग चमक के साथ जवाब दिया: “मैं युद्ध लड़ता हूं… लेकिन एक बहादुर लड़की की जान नहीं ले सकता।”
उस दिन से कुछ बदल गया। रात-रात भर छुपकर मिलने लगे। पहले युद्ध की बातें होती थीं… फिर धीरे-धीरे दिल की बातें शुरू हुईं। सिया बोली, “ये लड़ाई हमें खा रही है… हमारे लोगों को, हमारे दिलों को।” विक्रम ने जवाब दिया, “तुमने मुझे बताया कि शांति भी एक लड़ाई है… और मैं उस लड़ाई के लिए तैयार हूं।”

धीरे-धीरे… दोनों को प्यार हो गया। सच्चा, गहरा, वो प्यार जो जान की परवाह नहीं करता। लेकिन एक बहुत बड़ी समस्या थी — अगर ये राज किसी को पता चल गया… तो दोनों को मौत की सजा मिलेगी। दोनों राज्यों के राजा, दोनों के पिता, युद्ध जारी रखना चाहते थे। प्यार की खबर उनके लिए सबसे बड़ा अपराध था।
फिर आया वो निर्णायक दिन। आखिरी युद्ध। दोनों सेनाएं आमने-सामने। तीर चलने को तैयार। ठीक उसी पल… सिया और विक्रम दोनों घोड़ों पर तेजी से आगे निकले। सिया ने पूरी सेना के सामने चीखकर कहा: “रुको! सब रुको! ये युद्ध हमें नहीं, हमारे लोगों को बर्बाद कर रहा है!”
विक्रम ने अपनी तलवार जमीन पर फेंक दी। उच्च स्वर में बोला: “हम प्यार करते हैं! हम दुश्मन नहीं, साथी बनना चाहते हैं! अगर युद्ध जारी रहा तो दोनों राज्य तबाह हो जाएंगे। शांति चुनो!”
सन्नाटा छा गया। सैनिक स्तब्ध। फिर धीरे-धीरे आवाजें उठीं — “शांति! शांति!” आवाज बढ़ती गई… पूरी सेना चीखने लगी। दोनों राजा पहले गुस्साए… फिर झुक गए। शांति संधि हो गई।
और शांति की निशानी बनकर… सिया और विक्रम की शादी हुई। फूलों की बारिश, हाथी-बारात, दोनों राज्य एक हो गए। महल में दोनों एक साथ तख्त पर।
सीख जो इस कहानी से मिलती है: दो दिल अगर सच में मिल जाएं, तो नफरत की कोई भी दीवार नहीं टिकती। प्यार से बड़ा कोई हथियार नहीं। शांति युद्ध से लाख गुना बड़ी जीत है।
क्या तुम्हें लगता है… ऐसा प्यार आज भी कहीं हो सकता है? कमेंट में जरूर बताओ। ❤️