बंटवारा दिल का: अखाड़े की धूल और घर की मर्यादा

परिचय: घर का सन्नाटा और सरला की कसक

मंडी के मशहूर जमींदार रहे ठाकुर भवानी सिंह का रुतबा पूरे इलाके में था। चौड़ी छाती, सफेद मूंछें और अखाड़े की कसरत ने साठ की उम्र में भी उन्हें लोहे जैसा मजबूत बना रखा था। उनका बड़ा बेटा तो शहर जाकर बाबू बन गया, पर छोटा बेटा अजीत गांव में ही रह गया।

अजीत शक्ल-सूरत में तो ठीक था, पर स्वभाव से बड़ा ही सीधा और थोड़ा ‘ठंडा’ था। न उसे कसरत का शौक था, न ही मर्दाना रौब का। वह बस खेतों का हिसाब रखता और शाम को थककर जल्दी सो जाता। उसकी पत्नी थी सरला—गांव की सबसे सुंदर और चंचल गोरी। सरला की जवानी हिलोरे मारती थी, पर उसे घर में वह ‘गरमाहट’ नहीं मिलती थी जिसकी एक नई नवेली दुल्हन को तलाश होती है।

आग और पानी का मेल

शादी के कुछ महीनों बाद ही सरला को समझ आ गया कि उसका पति अजीत बस ‘मिट्टी का माधो’ है। उसे न तो सरला की सजधज से मतलब था, न ही उसकी आंखों की प्यास से। दूसरी तरफ, घर के आंगन में रोज सुबह उनके ससुर भवानी सिंह धोती बांधकर मुगदर घुमाते थे। उनके बदन की कसी हुई मांसपेशियां और अखाड़े की धूल में लिपटी देह देखकर सरला के मन में अजीब सी हलचल होने लगी।

सरला संस्कारी थी, पर जवानी की आग मर्यादा की दीवारें लांघने को बेताब थी। उसने एक दिन तय किया कि अगर पति से वो सुख नहीं मिल रहा, तो ससुर की सोई हुई जवानी को ही जगाया जाए।

घूंघट की ओट में गहरा खेल

सरला ने अपना रंग दिखाना शुरू किया। वह जानबूझकर सुबह-सुबह जब भवानी सिंह अखाड़े से लौटते, तो उनके पैर दबाने के बहाने उनके करीब बैठ जाती। “बाबूजी, आपके बदन में तो अभी भी पत्थर जैसी जान है, अजीत जी तो जैसे रुई के बने हैं,” वह अपनी रेशमी आवाज में कहती और उनका घुटना दबाते-दबाते हाथ थोड़ा ऊपर तक ले जाती।

कभी वह जानबूझकर उनके कमरे में आधी रात को पानी देने जाती, बदन पर सिर्फ एक ढीला सा कुर्ता और पेटीकोट पहनकर। जब भवानी सिंह की नजर पड़ती, तो वह तिरछी नजरों से मुस्कुराकर अपना पल्लू कंधे से सरका देती। भवानी सिंह भी इंसान थे, बहू की इस ‘खुली दावत’ ने उनके संयम के बांध में दरार पैदा कर दी।

एक दोपहर, जब अजीत खेतों पर था, सरला ने मर्यादा की सारी हदें तोड़ दीं। वह ससुर के कमरे में गई और अपनी पीठ उनकी तरफ करके बैठ गई। “बाबूजी, जरा देखिए तो मेरी कमर में बहुत दर्द है, थोड़ी मालिश कर दीजिए ना…” कहते हुए उसने अपने ब्लाउज की डोर ढीली कर दी। भवानी सिंह के कांपते हाथों ने जैसे ही बहू की चिकनी पीठ छुई, सालों का संयम टूट गया। उस दोपहर घर की चारदीवारी ने वो सब देखा जो समाज की नजरों में गुनाह था, पर सरला की प्यास के लिए वही सच था।

ससुर का पश्चाताप और बड़ा फैसला

हफ्तों तक यह लुका-छिपी का खेल चलता रहा। सरला खुश थी, पर भवानी सिंह के अंदर का ‘ठाकुर’ उसे कचोटने लगा। एक रात जब सरला उनकी बाहों में थी, भवानी सिंह ने कहा, “बहू, ये सुख तो हम दे रहे हैं, पर इस घर का असली वारिस अजीत को ही देना होगा। मैं ससुर होकर बाप तो बन सकता हूं, पर समाज की नजरों में वो बच्चा मेरा पोता ही कहलाएगा। ये दाग मिटाना होगा।”

अगली सुबह से भवानी सिंह ने ‘बंटवारा दिल का’ कर दिया। उन्होंने सरला को साफ कह दिया— “अब से तुझे रात की नहीं, सुबह की मेहनत देखनी होगी।”

अजीत का कायाकल्प

भवानी सिंह ने अपने सीधे-सादे बेटे अजीत को सुबह 4 बजे बिस्तर से उठाना शुरू किया। “बेटा, अगर घर की इज्जत बचानी है, तो ये सुस्ती छोड़ और अखाड़े में उतर,” उन्होंने गरजते हुए कहा। अजीत जो पहले आधा किलोमीटर भी नहीं दौड़ सकता था, अब उसे डंडे के जोर पर दौड़ाया गया। भवानी सिंह ने उसे खुद अखाड़े में दांव-पेंच सिखाए, बादाम-मिश्री का दूध पिलाया और असली घी का चूरमा खिलाया।

सरला पहले तो चिढ़ी, पर जब उसने देखा कि अजीत के शरीर में बिजली जैसी फुर्ती आ रही है और उसकी छाती चौड़ी होने लगी है, तो उसकी नजरें बदल गईं। अब अजीत शाम को खेतों से लौटकर जल्दी सोता नहीं था, बल्कि सरला को अपनी बाहों में लेकर अखाड़े के दांव-पेंच आजमाता था।

सुखद समापन

कुछ महीनों की मेहनत ने रंग दिखाया। अजीत अब गांव का सबसे तंदुरुस्त जवान बन गया था। सरला को अब बाहर झांकने की या ससुर के कमरे के चक्कर काटने की जरूरत नहीं रही। उसे अपने पति में ही वो ‘मर्दाना जज्बा’ मिल गया जिसकी उसे चाहत थी।

भवानी सिंह अब सुकून से आंगन में बैठकर हुक्का पीते हैं और अपनी बहू-बेटे की खुशहाल गृहस्थी देखते हैं। अब उनके घर में एक नन्हे वारिस की किलकारियां गूंजने वाली हैं, जो अजीत की ही संतान है।


कहानी की सीख:

  1. कसरत ही असली गहना है: एक पुरुष की असली ताकत उसके शरीर और उसके आत्मविश्वास में होती है, जो मेहनत से ही आती है।
  2. मर्यादा की रक्षा: भटकना मानवीय है, पर समय रहते खुद को और अपने परिवार को सही रास्ते पर लाना ही बड़प्पन है।
  3. बदलाव संभव है: अगर इरादा मजबूत हो, तो एक ‘मिट्टी का माधो’ भी शेर बन सकता है।

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