इश्क़, फ़र्ज़ और एक समझौता: मंदसौर की एक अधूरी मगर पूरी प्रेम कहानी

मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक जिला मंदसौर… दरअसल, यहाँ की फिजाओं में आज भी कई अनकही कहानियाँ गूंजती हैं। इन्हीं वादियों के बीच एक छोटा सा गाँव है, जहाँ एक ऐसी प्रेम कहानी ने जन्म लिया, जिसने समाज के सारे नियमों को तोड़कर अपने नियम खुद बनाए। यह कहानी है सरोज, ईश्वर और माधुरी की।

मंदसौर की प्रेम कहानी की शुरुआत

वैसे तो सरोज एक संभ्रांत और संपन्न परिवार की बेटी थी, लेकिन नियति ने उसे अपने माता-पिता से दूर ननिहाल भेज दिया। नाना-नानी के लाड़-प्यार में पली-बढ़ी सरोज के दिल में एक खालीपन था, जिसे भरने के लिए शायद वो किसी अपने की तलाश में थी।

इसी बीच, उसी गाँव में सरोज के घर के पास ईश्वर का परिवार रहता था। ईश्वर, जो भले ही उम्र में सरोज से 4 साल छोटा था, मगर उसका अंदाज़ किसी “हीरो” से कम नहीं था।

ईश्वर के चलने का तरीका, उसका बेफिक्र होकर सिगरेट पीना और उसकी वो “रालय” अदा… सरोज अपने घर की खिड़की से घंटों उसे निहारा करती थी। हालाँकि, ईश्वर को खबर भी नहीं थी कि कोई उसे दीवानों की तरह चाहता है। फिर भी, सरोज ने मान लिया था कि ईश्वर ही उसका संसार है।

तूफानी रात और जज़्बातों का सैलाब

प्रेम कहानियों में अक्सर कुदरत भी अपना खेल खेलती है। हुआ यूँ कि एक रात, जब आसमान से बारिश आफत बनकर बरस रही थी, ईश्वर अपने बाड़े (पशुओं के घर) में जानवरों को सुरक्षित करने गया। अँधेरी रात और मूसलाधार बारिश में ईश्वर को कुछ सूझ नहीं रहा था। तभी, एक छतरी के सहारे सरोज वहां पहुंची।

उस रात, बादलों की गड़गड़ाहट के बीच दो दिल धड़क रहे थे। अनाज के ढेर पर, बारिश की बूंदों की आवाज़ के बीच, सरोज और ईश्वर ने सामाजिक दायरों को लांघ दिया। नतीजतन, सरोज ने अपना सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर दिया। यद्यपि उस मिलन में शारीरिक संतुष्टि से ज़्यादा भावनाओं का ज्वार था, इसके बावजूद उस रात ईश्वर को भी सरोज से बेपनाह मोहब्बत हो गई। परिणामस्वरूप, अब वो दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे।मंदसौर की प्रेम कहानी

अतीत का साया और फर्ज़ की दीवार

लेकिन हर प्रेम कहानी में इम्तिहान ज़रूर होता है। दरअसल, ईश्वर के जीवन का सच यह था कि उसकी शादी बचपन में ही उसके दादाजी की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए माधुरी से कर दी गई थी। जब यह सच सरोज के सामने आया, तो भी उसने इसे हंसकर स्वीकार कर लिया, क्योंकि उसका प्रेम शर्तों से परे था।

मुश्किल तब बढ़ी जब माधुरी का “गौना” हुआ और वह ससुराल आ गई। चूँकि ईश्वर का दिल और दिमाग तो सरोज के पास था, इसलिए वह अपने घर जाने के बजाय बाड़े में सरोज की यादों के सहारे रातें गुज़ारता। उधर, माधुरी सुहागरात की सेज पर इंतज़ार करती रही, परंतु ईश्वर नहीं आया।

समाज, बदनामी और एक निडर फैसला

इसके बाद, गाँव में बातें बनने लगीं। लिहाज़ा, सरोज को उसके माता-पिता के पास वापस मंदसौर भेज दिया गया। दूसरी ओर, ईश्वर के पिता मदनलाल जी और सरोज के परिवार वाले परेशान थे। समाज की नाक बचाने के लिए हर कोशिश की गई।

बहरहाल, माधुरी, जो एक भारतीय नारी की मर्यादा की प्रतीक थी, उसने भी हार नहीं मानी। उसने ईश्वर से भीख नहीं, बल्कि अपना अधिकार माँगा। उसने कहा, “मुझे पता है आप सरोज से प्रेम करते हैं, लेकिन मेरी क्या गलती है? मुझे समाज में सर उठा कर जीने के लिए एक सहारा दे दीजिये, मुझे एक औलाद दे दीजिये, फिर आप जहाँ चाहे जा सकते हैं।” माधुरी के त्याग और सरोज की ज़िद के बीच ईश्वर पिस रहा था। अंततः, प्रेम को एक रास्ता निकालना पड़ा।

जब पत्नी और प्रेमिका आमने-सामने आईं: एक अनोखा फैसला

ईश्वर छिपते-छिपाते सरोज के घर पहुँच गया था। दोनों कमरे में बंद थे, अभी कुछ बातें हो ही रही थीं कि अचानक बाहर शोर हुआ। सरोज के घर के बाहर ईश्वर के पिता मदनलाल, माँ और खुद माधुरी खड़े थे। बात अब घर की चारदीवारी से बाहर निकल चुकी थी।मंदसौर की प्रेम कहानी

सरोज ने बिना डरे दरवाज़ा खोला। सामने माधुरी खड़ी थी—आँखों में आंसू और माथे पर वो सिन्दूर जो शायद अब खतरे में था। ईश्वर, जो अब तक शेर बनता था, अपने माँ-बाप और पत्नी को एक साथ देखकर दीवार से सट गया। इसके विपरीत, माधुरी ने कोई हंगामा नहीं किया, न ही सरोज को गाली दी। वह आगे बढ़ी और सरोज के सामने अपने हाथ जोड़ दिए। उसकी आवाज़ कांप रही थी, पर उसमें एक पत्नी का दर्द था।

माधुरी ने कहा: “बहन, मैं जानती हूँ कि ईश्वर का दिल तुम्हारे पास है। पर मेरी मांग का सिन्दूर मेरे पिता की इज़्ज़त है। तुमने मेरा पति तो छीन लिया, पर मेरा देवता मत छीनो। मुझे समाज में ‘विधवा’ मत बनाओ, मेरी नाक मत कटवाओ। इसे रख लो, पर मुझे भी थोड़ा सहारा दे दो।”

ईश्वर के माता-पिता सर झुकाए खड़े थे, उनकी आँखों में बेबसी थी। सरोज ने माधुरी को देखा। भले ही एक औरत होने के नाते उसे माधुरी के दर्द का एहसास हुआ, लेकिन वो अपने प्यार (ईश्वर) को छोड़ने के लिए भी तैयार नहीं थी। तभी सरोज की आँखों में एक अजीब सी चमक आई। उसने माधुरी के जुड़े हुए हाथों को नीचे किया और एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने वहां खड़े सबकी रूह कंपा दी। सरोज ने ईश्वर की तरफ इशारा करते हुए कहा: “देख माधुरी, मैं तेरा घर नहीं उजाड़ूँगी, परन्तु अपना घर भी सूना नहीं रखूँगी। सुन मेरा फैसला—”मंदसौर की प्रेम कहानी

तेरा पति रहेगा

“दुनिया के लिए ये तेरा पति रहेगा, तेरा सुहाग रहेगा। समाज में इसके नाम की चूड़ियाँ तू ही पहनेगी। लेकिन… हफ्ते के 3 दिन और 3 रातें मेरी होंगी। उन 3 दिनों में इस पर न तेरा हक़ होगा, न तेरे परिवार का। बाकी के 4 दिन तू इसे जैसे चाहे रख। बता, मंजूर है तुझे ये बंटवारा?”

वहां सन्नाटा छा गया। मदनलाल जी कुछ बोलना चाहते थे, पर रुक गए। चूँकि माधुरी जानती थी कि अगर उसने ‘ना’ कहा, तो ईश्वर उसे हमेशा के लिए छोड़कर सरोज के पास चला जाएगा। अतः, उसने भारी मन से, अपने सुहाग को बचाने के लिए सर हिला दिया।

इस कहानी से सीख (Moral of the Story)

  1. सबसे पहले, प्रेम सिर्फ पाने का नाम नहीं है: सरोज ने ईश्वर को पाने के लिए समाज की परवाह नहीं की, साथ ही उसने माधुरी के अस्तित्व को भी स्वीकारा। यह प्रेम में “एडजस्टमेंट” की पराकाष्ठा है।
  2. मर्यादा और सहनशीलता: माधुरी सिखाती है कि जब परिस्थिति विपरीत हो, तो भागने की बजाय धैर्य से काम लेना चाहिए। उसने अपना घर टूटने नहीं दिया और अपनी जगह भी बनाई।
  3. निष्कर्षतः, खुशी का कोई एक पैमाना नहीं होता: ज़रूरी नहीं कि हर रिश्ता समाज के बनाये “परफेक्ट” ढांचे में फिट हो। कभी-कभी हमें अपनी खुशी के लिए अपने नियम खुद बनाने पड़ते हैं, जैसे ईश्वर, सरोज और माधुरी ने बनाए।

यह कहानी साबित करती है कि प्रेम अंधा होता है, लेकिन जब उसे निभाने की बात आती है, तो उसे बहुत समझदार होना पड़ता है।

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