(लेखक: वीरेंद्र साहब की जुबानी)

परिचय: होनहार चंदा और एक तरफा प्यार
कहानी की शुरुआत होती है चंदा से। चंदा, जो न सिर्फ पढ़ने-लिखने में होशियार थी, बल्कि खेल-कूद में भी पूरे स्कूल की शान थी। कबड्डी का मैदान हो या पढ़ाई की क्लास, चंदा हमेशा अव्वल आती थी। स्कूल के टीचर हों या साथी, सबकी जुबान पर बस चंदा की ही तारीफ होती थी।
उसी स्कूल में दो क्लास आगे पंकज नाम का एक लड़का था। पंकज की नजर हमेशा चंदा पर रहती थी। वह चंदा की शारीरिक और मानसिक मजबूती का दीवाना था। उसने ठान लिया था कि शादी करूंगा तो चंदा से ही। उसने लव लेटर भी भेजे, सहेलियों से सिफारिश भी लगवाई, लेकिन चंदा के इरादे मजबूत थे। उसने पंकज को साफ मना कर दिया। उसका सपना था खेल की दुनिया में नाम कमाना और अपने मां-बाप का सिर ऊंचा करना।
पंकज ने उसके रास्ते में बहुत कांटे बिछाए, उसे रोकने की कोशिश की, ताकि वह हार मानकर उसकी हो जाए। लेकिन चंदा कॉलेज तक पहुंची और अपनी मर्यादा में रहकर पढ़ाई पूरी की।
शादी और सोहन की एंट्री
वक्त का पहिया घूमा और चंदा की शादी राधेश्याम जी के बेटे सोहन से हो गई। चंदा ने सोचा कि लड़की चाहे कलेक्टर हो या एसपी, शादी तो उसे करनी ही पड़ती है, यह दुनिया की रीत है। इसलिए उसने भी परिवार की मर्जी से सात फेरे ले लिए।

उधर सोहन का हाल थोड़ा अलग था। राधेश्याम जी की पत्नी (सोहन की मां) के गुजर जाने के बाद, सोहन का पालन-पोषण उसकी बुआ ने किया था। लाड़-प्यार ने सोहन को बेहद आलसी बना दिया था। वह न काम करता था, न शरीर का ध्यान रखता था। बस पिता की किराने की दुकान पर गद्दी तोड़ता रहता था। मोटा शरीर, चेहरे से गायब रौनक और जवानी में ही बुढ़ापे की झलक—यही सोहन की पहचान थी।
असंतोष और मर्यादा की दीवार का टूटना
शादी के बाद चंदा को जिस सुख और हमसफर की तलाश थी, वह सोहन में नहीं मिला। सोहन आलसी तो था ही, साथ ही वह चंदा को वो शारीरिक सुख नहीं दे पाता था जिसकी एक नई-नवेली दुल्हन को उम्मीद होती है। सोहन दुकान पर बैठा रहता और उसके पिता राधेश्याम जी अब उम्र के पड़ाव पर घर पर आराम करने लगे थे।
इधर चंदा संस्कारी थी, पर जवानी की प्यास उसे चैन से जीने नहीं दे रही थी। जब पति से वो सुख नहीं मिला, तो उसकी नज़र घर में मौजूद ससुर राधेश्याम जी पर गई। राधेश्याम जी उम्रदराज जरूर थे, लेकिन घर में आराम करते-करते उनका शरीर अभी भी गठीला था।
चंदा ने जैसा सोचा था, वैसा ही प्लान बनाया।
उसने शर्म और हया के घूंघट को खूंटी पर टांग दिया। वह जानबूझकर नहाने के तुरंत बाद, गीले बालों में और बदन पर लिपटे तौलिए या मामूली कपड़ों में सीधे अपने ससुर राधेश्याम जी के सामने आ जाती। बदन से टपकता पानी राधेश्याम जी के सूखे जीवन में हलचल मचाने लगा।

वह यहीं नहीं रुकी। अक्सर वह राधेश्याम जी के कमरे में ही पेटीकोट और ब्लाउज पहनकर तैयार होने लगती। कभी-कभी जानबूझकर अपनी पीठ ससुर जी की तरफ घुमाकर खड़ी हो जाती और बड़े लाड़ से कहती— “बाबूजी, जरा मेरे ब्लाउज का बटन तो लगा दीजिए, मेरा हाथ पीछे नहीं जा रहा।” राधेश्याम जी के हाथ कांपते, लेकिन बहू की जिद्द के आगे वो पिघलने लगे।
हद तो तब हो गई जब चंदा ने संकोच की सारी हदें पार कर दीं। वह अपने सबसे निजी कपड़े—अपने अंडरवियर और ब्रा—राधेश्याम जी के हाथों में थमा देती और बड़े बेफिक्र अंदाज में कहती— “बाबूजी, मैं काम में व्यस्त हूं, ज़रा ये कपड़े छत के ऊपर धूप में डाल आइएगा।”
ससुर के हाथ में बहू के ऐसे कपड़े देखकर राधेश्याम जी का बचा-खुचा संयम भी टूट गया। पहले तो वो मान-मर्यादा में रहे, लेकिन घर के अंदर ही जब ऐसी ‘खिचड़ी’ पकने को तैयार थी, तो उन्होंने भी ससुर के ताज को एक तरफ रख दिया।
फिर वही हुआ जो चंदा चाहती थी। राधेश्याम जी ने चंदा को वो चरम सुख दिया, जिसकी उसे बरसों से तलब थी। चंदा ने भी राधेश्याम जी से वो सब मांगा और पाया जिसकी वह हकदार थी। घर की चारदीवारी के भीतर ही जिस्म की प्यास बुझाई गई।
चंदा का फैसला और सोहन का कायाकल्प
कुछ वक्त तक यह सब चलता रहा, लेकिन चंदा समझदार थी। एक रात जब वह राधेश्याम जी की बाहों में थी, तो उसने एक कड़वा सच उनके सामने रखा। उसने कहा, “सुनिए, आप मुझे सुख तो दे सकते हैं, लेकिन मुझे मेरी कोख में बच्चा नहीं दे सकते। मुझे सोहन का ही बच्चा चाहिए, यही समाज का नियम है और यही मेरी जिद। अब आपकी उम्र हो गई है, सोहन को ठीक करना ही होगा।”

राधेश्याम जी भी हकीकत समझ गए और मान गए। लेकिन चंदा ने उसी रात फैसला ले लिया। अगली सुबह से उसने सोहन की डोर अपने हाथ में ले ली।
चंदा ने सोहन को सुबह जल्दी उठाना शुरू किया। उसे जबरदस्ती ग्राउंड ले जाने लगी। सोहन, जो हिलना भी नहीं चाहता था, पत्नी की जिद के आगे मजबूर हो गया। चंदा ने उसे दौड़ाया, कसरत करवाई और दूध वाले से असली दूध की बंदी करवाई। सुबह-शाम की मेहनत, दौड़ और अच्छे खान-पान ने रंग दिखाया।
सुखद अंत
धीरे-धीरे सोहन के शरीर से आलस गया और ताकत वापस आई। उसके हार्मोंस बदले और चेहरे पर लाली लौटी। अब सोहन सिर्फ दुकान का मालिक नहीं, बल्कि बिस्तर का भी राजा बन गया। चंदा को अब बाहर झांकने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि उसे अपने पति में ही सब कुछ मिल गया।
आज उनका घर खुशहाल है। दोनों का एक प्यारा सा बेटा है। सोहन और चंदा मिलकर दुकान और घर दोनों को बखूबी संभाल रहे हैं। चंदा ने पापड़ का बिजनेस भी शुरू कर दिया है। भटकी हुई राहें अब एक सुंदर मंजिल पर पहुंच चुकी हैं।
कहानी से सीख (Moral of the Story)
- सेहत ही असली मर्द की पहचान है: सोहन के उदाहरण से पता चलता है कि आलस इंसान को बर्बाद कर देता है, जबकि अच्छी सेहत और कसरत से खोई हुई जवानी और गृहस्थी की खुशियां वापस पाई जा सकती हैं।
- औरत चाहे तो क्या नहीं कर सकती: एक पत्नी चाहे तो घर बिगाड़ भी सकती है और चाहे तो उसी पति को तराश कर हीरा भी बना सकती है। चंदा ने सोहन को बदलकर अपना घर बचा लिया।
- समय रहते सुधार: इंसान भटक सकता है, लेकिन समझदारी इसी में है कि समय रहते अपनी गलती सुधारी जाए और सही रास्ते को चुना जाए।
- संघर्ष से सफलता: गरीबी और अभाव के बावजूद, मेहनत और सही दिशा इंसान को खुशहाल बना देती है।
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