घर की रानी या बाहर की गुड़िया? (शारदा और प्रभु की प्रेम कहानी)

(लेखक: वीरेंद्र साहब की जुबानी)

आज की जो प्रेम कहानी है, वो एक लव स्टोरी है मालवा के एक छोटे से गाँव की। यह कहानी है शारदा की।

शारदा… मैं ऐसा हमेशा मानता हूँ कि मैं शारदा के किरदार पर बहुत फ़िदा हूँ। वो कोई नाजुक कली नहीं थी, बल्कि एक भरी-पूरी, मजबूत देह की मालकिन थी। हट्टी-कट्टी बाहें, उसका चलना, उसका खाना-पीना और बातें करना… वो एक ऐसी औरत थी कि अगर वो एक बार कह दे, तो उसके नाम पूरी जिंदगी करने में कोई हर्ज नहीं।

यह कहानी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र की है। शारदा के माँ-बाप, जगदीश और माता लड़की बाई, मजदूरी करके घर चलाते थे। शारदा के दिमाग में बस एक ही बात चलती थी कि मेरी शादी हो जाएगी, मैं ससुराल जाकर मजदूरी करूँगी और अपने घरवाले के बच्चे पैदा करके उन्हें पालूँगी। उसे दुनियादारी से कोई मतलब नहीं था।

जवानी का नशा और प्रभु से इश्क

शारदा की सगाई प्रभु नाम के लड़के से हुई। प्रभु के माता-पिता गरीब थे, लेकिन प्रभु पढ़ने में ठीक था और आर्मी (Army) की तैयारी कर रहा था ताकि घर की गरीबी मिट सके।

सगाई के बाद शारदा ने प्रभु को शहर बुलाना शुरू कर दिया। प्रभु को भी नया-नया प्यार का चस्का था। दोनों होटल में रूम बुक करते और शादी से पहले ही शादी वाला काम कर लेते थे। शारदा ने अपना पूरा यौवन, अपनी जवानी का पूरा जोश प्रभु को सौंप दिया। प्रभु, जो आर्मी की फिजिकल तैयारी कर रहा था, उसका ध्यान अब दौड़ने-भागने से हटकर शारदा के जिस्म पर आ गया। उसने शारदा को बिस्तर पर वो चरम सुख दिया जिसकी शारदा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

नतीजा यह हुआ कि प्रभु आर्मी में नहीं जा पाया और शारदा के घर वालों ने जल्दी शादी कर दी।

बदहाली और सत्यनारायण का जाल

शादी के बाद स्थितियाँ बिगड़ गईं। प्रभु बेरोजगार था, घर का खर्च और माँ-बाप की बीमारी ने उन्हें तोड़ दिया। प्रभु ने बैंक से लोन लेकर जैसे-तैसे घर बनाया, पर चुकाने के पैसे नहीं थे। दोनों मजदूरी करने लगे।

एक दिन प्रभु शहर से बाहर था। शारदा को पैसों की जरूरत थी, तो वह ठेकेदार सत्यनारायण के पास गई। सत्यनारायण की नजर शारदा की खूबसूरती और उसके गठीले बदन पर पहले से थी। उसने शारदा से कहा: “शारदा, मैं तेरे सारे पैसे दे दूँगा, तेरी मदद करूँगा, पर तुझे मेरे साथ सोना पड़ेगा। मैं तुझे अपनी रखैल बनाकर रखूँगा, तुझे रानी की तरह रखूँगा।”

शारदा को बुरा लगा, पर गरीबी और हालात से मजबूर होकर उसने समझौता कर लिया। वह अपना घर छोड़कर सत्यनारायण के दिए कमरे में रहने लगी। प्रभु ने उसे बहुत समझाया, लेकिन शारदा को अब आराम की आदत लग चुकी थी। सत्यनारायण उसे वीआईपी (VIP) सुविधाएं देता, अच्छा राशन-पानी और कपड़े लाता। शारदा को लगा कि यही असली सुख है।

धोखा और जमीर की आवाज

एक दिन सत्यनारायण अपने दोस्त मोहन को लेकर आया। उसने शारदा से मटन और रोटियाँ बनवाईं। वहां खूब दारू चली। मोहन की नीयत खराब थी, उसने सत्यनारायण की शराब में नींद की गोलियाँ मिला दीं। जब ठेकेदार बेहोश हो गया, तो मोहन शारदा के कमरे में घुस गया और उसके साथ जबरदस्ती की। शारदा चिल्लाती रही, पर सुनने वाला कोई नहीं था।

अगली सुबह, फिर सत्यनारायण ने कहा कि आज 4-5 मजदूर और दोस्तों का खाना बनाना है। शारदा जब मटन के लिए मसाला पीस रही थी और चूल्हे पर रोटियाँ सेक रही थी, तो उसे अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ।

उसने सोचा— “मैं यहाँ क्या कर रही हूँ? मैं उन 4-5 मर्दों के लिए खाना बना रही हूँ जिन्हें मैं जानती तक नहीं। जो मुझे सिर्फ हवस की नजर से देखते हैं। मैं यहाँ आराम के लिए पड़ी हूँ, पर मेरी इज्जत कौड़ी की नहीं है। इससे तो अच्छा था कि मैं अपने प्रभु के साथ रूखी-सूखी खाती, कम से कम वो घर मेरा अपना तो था। मैं वहाँ पत्नी थी, यहाँ सिर्फ एक खिलौना हूँ।”

शारदा ने वहीं फैसला किया कि अब उसे इस बदहाल जिंदगी में नहीं रहना। उसे वापस अपने प्रभु के पास जाना है।

वापसी और खुशहाल जीवन

तभी शारदा ने देखा कि मोहन फिर से शराब में दवाई मिला रहा है। शारदा ने चुपके से फोटो खींच लिया और सत्यनारायण को दिखा दिया। वहां हंगामा हुआ और शारदा ने निडर होकर बता दिया कि मोहन ने उसके साथ क्या किया था।

शारदा ने वह नरक छोड़ दिया और वापस प्रभु के पास आ गई। इधर प्रभु ने शारदा के जाने के बाद जी-जान से मेहनत की थी और पुलिस की परीक्षा पास कर ली थी। उसकी नौकरी लग चुकी थी।

शारदा ने प्रभु के पैरों में गिरकर माफी मांगी। प्रभु चाहता तो उसे ठुकरा सकता था, क्योंकि अब वह एक सरकारी नौकर था और शारदा कलंकित थी। लेकिन प्रभु ने उसे माफ कर दिया और उसे अपनाया। आज प्रभु और शारदा के एक लड़का और एक लड़की है और दोनों खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।


कहानी की सीख (Moral of the Story):

“दो वक्त की रूखी रोटी अपने घर में खा लेना, लेकिन सोने की थाली के लालच में दूसरों की चौखट पर मत जाना। क्योंकि पराये घर में पेट तो भर सकता है, लेकिन मन और इज्जत कभी नहीं भरती।”

और दूसरी सीख यह है कि “सच्चा प्रेम वही है जो गलती सुधारने का मौका दे और अपने साथी को माफ करना जाने।”

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